चना उत्पादक किसानों के लिए वैज्ञानिकों ने जारी की एडवाइजरी

चना उत्पादक किसानों के लिए वैज्ञानिकों ने जारी की एडवाइजरी
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भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने चने का उत्पादन करने वाले किसानों के लिए महत्वपूर्ण सुचना जारी की है। इस दिशा में विज्ञानिक सलाह और निर्देशों के माध्यम से, ICAR ने रबी की फसल की बुआई की प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए किसानों को मार्गदर्शन किया है। दलहन की फसल चने की बुआई की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है, और ICAR ने इसके लिए विशेष एडवाइसरी प्रदान की है। इसका उद्देश्य है किसानों को कम लागत में अधिक उत्पादन की दिशा में मार्गदर्शन करना।

चने की खेती: भूमि एवं जल संरचना

चने की खेती देशभर में बड़े पैम्प और स्तर पर की जा रही है। इसमें राजस्थान, हरियाणा जैसे सुखद क्षेत्रों का विशेष उल्लेख है, जो इसे सुगम बनाते हैं। यहां बारिश की मात्रा 60 से 90 सेंटीमीटर के आसपास होनी चाहिए और तापमान की दृष्टि से 24-30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहना चाहिए। उत्तरी पूर्वी और मध्य भारतीय क्षेत्रों के लिए यह सबसे उपयुक्त है।

चने की खेती के लिए उपयुक्त भूमि का चयन

अच्छे उत्पादन के लिए, मिटटी का PH मान 5.5 से 7 के बीच होना चाहिए और मिटटी हल्की से भारी होनी चाहिए। यहां तापमान का अंदाजा भी आपकी खेती के लिए महत्वपूर्ण है। चने की सिंचाई को ध्यान में रखते हुए, भूमि की निकासी भी बहुत अच्छी होनी चाहिए ताकि चने के पौधों की जड़ें सुष्ठ रहें।

चने की फसल की तुड़ाई और खरपतवार का निवारण

चने की बुआई के 30-40 दिन बाद, शीर्ष कलियों की तोड़ाई करना फायदेमंद है। इससे पौधे में अधिक फूटवार होते हैं, और ग्रोथ को प्रोत्साहित किया जाता है। इसके अलावा, फसल में खरपतवार का सही समय पर निवारण भी अच्छे उत्पादन के लिए आवश्यक है। इस निवारण का कार्य बुआई के एक महीने बाद किया जाना चाहिए। इससे पौधों की जड़ें अधिक फैलती हैं और फसल में खरपतवार का समर्थन किया जाता है।

चने की खेती: ICAR से आधारित सुझाव

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने चने का उत्पादन करने वाले किसानों के लिए महत्वपूर्ण सुझाव जारी किए हैं। रबी की फसलों की बुआई और दलहन की फसल के लिए एडवाइसरी का प्रदान करते हुए, ICAR ने किसानों को बेहतर और लागत-कुशल उत्पादन की दिशा में मार्गदर्शन किया है।

चने की खेती: भूमि और जल का विवेचन

चने की खेती देशभर में बड़े पैम्प और स्तर पर हो रही है, विशेषकर राजस्थान और हरियाणा में जहां इसकी खेती सुनिश्चित रूप से हो सकती है। इसे सुगम बनाने के लिए बारिश की मात्रा, तापमान, और भूमि का पीएच ध्यान में रखना चाहिए। इससे उत्तरी पूर्वी और मध्य भारतीय क्षेत्रों में यह अधिक सफल हो सकती है।

चने की खेती के लिए उपयुक्त भूमि

चने की अच्छी फसल के लिए भूमि का चयन करते समय, उचित भूमि की नमी, भार, और पीएच की मान का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है। सही भूमि में फसल का सफल उत्पादन होता है और इसमें सिंचाई की आवश्यकता भी कम होती है।

चने की फसल की तुड़ाई और खरपतवार का निवारण

चने की बुआई के 30-40 दिन बाद, शीर्ष कलियों की तोड़ाई एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे पौधों की ग्रोथ में सुधार होता है और फुटवार बनते हैं। खरपतवार का निवारण भी बुआई के एक महीने बाद होना चाहिए, ताकि चने की पौधों को सही रूप से विकसित होने में मदद मिले।

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