किसान भाई ध्यान दे! धान, गेहूं से इस फसल की करें खेती, होगा अधिक मुनाफा

किसान भाई ध्यान दे! धान, गेहूं से इस फसल की करें खेती, होगा अधिक मुनाफा
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Kuttu Ki Kheti: मिलेट्स अपने गुणों के कारण लोगों में बहुत पसंदीदा हो चुके हैं। इन्हें डाइट में शामिल करने से कई फायदे होते हैं। कुट्टू इन्हीं मिलेट्स में से एक है, जिसमें धान और गेहूं से अधिक पोषक तत्व होते हैं। कुट्टू सेहत के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है। कुट्टू के आटे में प्रोटीन, फाइबर, मैग्नीशियम, विटामिन-बी, आयरन, फोलेट, कैल्शियम, जिंक, मैग्नीज, कॉपर, और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसके सेवन से विभिन्न समस्याओं में राहत मिलती है। ऐसे में किसानों के लिए कुट्टू की खेती बहुत फायदेमंद साबित हो सकती है।

पोषण से भरपूर कुट्टू

बकव्हीट का उपयोग उसके फलों से होता है, जो तिकोने आकार के होते हैं और जिन्हें पीसकर आटा तैयार किया जाता है। यह आटा व्रतों में खाया जाता है। इसके पौधे के तने को सब्जी बनाने, फूल और हरी पत्तियों को दवाओं में उपयोग करने, फूल को ग्लूकोसाइड से निकालकर दवाओं में उपयोग करने, फूल को उच्च गुणवत्ता वाले शहद बनाने और इसके बीज का उपयोग नूडल, सूप, चाय, ग्लूटेन मुक्त बियर आदि बनाने में किया जाता है। इसमें धान और गेहूं से अधिक पोषण तत्व होते हैं।

यहां पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी खेती का प्रयोग सफल हो सकता है। यह ग्लूटेन मुक्त भोजन होता है, जिससे सिलिएक रोगियों के लिए यह अच्छा विकल्प होता है। यह फसल हरी खाद के रूप में भी उपयोगी होती है। इसे उन भूमियों में बोया जाता है जो रबी मौसम में देर से सूख जाती हैं और जहां लंबे समय तक खेती की जा सकती है।

कुट्टू की किस्में

किसानों को उन्नत कुट्टू की खेती करनी चाहिए ताकि वे कम मेहनत और कम समय में अधिक मुनाफा कमा सकें। उन्नत कुट्टू की किस्में में हिमप्रिया, हिमगिरी, सांगलाबी1, भी.एल.7, पीआर 'बी', हिम फाफर, शिमला 'बी' शामिल होती हैं। इसकी व्यापक खेती रूस में होती है और यह जंगली प्रजाति यूनान में भी पाई जाती है।

बुआई का सही समय

कुट्टू (Kuttu) रबी फसल है. इसकी बुआई 15 सितंबर से 15 अक्टूबर तक कर सकते हैं. बीज की मात्रा कुट्टू की किस्म पर निर्भर करती है. स्कूलेन्टम के लिए जहां 75-80 किग्रा प्रति हेक्टेयर बीज की जरूरत पड़ेगी वहीं टाटारीकम प्रजाति के लिए 40-50 किग्रा प्रति हेक्टेयर की मात्रा पर्याप्त होगी. कुट्टू के बीजों को छिड़काव विधि से बोते हैं और बुआई के बाद हल पाटा चलाकर बीजों को ढक दिया जाता है.

खाद और सिंचाई

आईसीएआर के मुताबिक, कुट्टू की फसल में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश को 40:20:20 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से डालने से पैदावार अच्छी मिलती है. इसको 5 से 6 सिंचाई की जरूरत होती है.

खरपतवार और कीट नियंत्रण

संकती पत्ती के लिए 3.3 लीटर पेन्डीमेथिलीन का 800-1000 लीटर पानी मे घोल बनाकर बुआई के 30-35 दिनों बाद छिड़काव करना चाहिए. कुट्टू की फसल में कीटों और रोगों का कोई प्रकोप नहीं देखा गया है. इसीलिए इसकी खेती में किसानों पर कीटनाशक का बोझ नहीं पड़ता.

कटाई और पैदावार

कु्ट्टू (Kuttu) की फसल एक साथ नहीं पकती. इसलिए इसे 70-80 फीसदी पकने पर काट लिया जाता है. इसकी दूसरी वजह यह भी है कि कुट्टू की फसल में बीजों के झड़ने की समस्या ज्यादा होती है. कटाई के बाद फसल का गट्ठर बनाकर, इसे सुखाने के बाद गहाई करनी चाहिए. कुट्टू की औसत पैदावार 11-13 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

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